रुबियो पर मोदी पर वार, कांग्रेस बोली – ‘दोस्त’ के लिए समझौता?

अमेरिकारुबियो पर मोदी पर वार, कांग्रेस बोली - 'दोस्त' के लिए समझौता?

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी पर साधा निशाना, अमेरिकी सांसद के बयान पर उठाए सवाल

नई दिल्ली: कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा प्रहार करते हुए अमेरिकी सांसद मार्को रुबियो द्वारा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर की गई टिप्पणियों पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दल का आरोप है कि प्रधानमंत्री, जिन्हें “समझौतावादी” बताया गया है, एक “अच्छे दोस्त” को खुश करने के लिए अत्यधिक प्रयास कर रहे हैं।

कांग्रेस के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने मोदी सरकार के भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को रद्द न करने के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे “जनविरोधी” और “खतरनाक” करार दिया। उन्होंने मलेशिया जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां की सरकारों ने ऐसे कदम उठाए हैं। रमेश ने इस बात पर भी चिंता जताई कि प्रधानमंत्री ने देशवासियों से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए घरेलू ईंधन की खपत और विदेश यात्रा कम करने की अपील की है, वहीं सरकार अमेरिका से बड़े पैमाने पर आयात पर सहमत हो रही है। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या आयात में यह वृद्धि भारतीय रुपये के और अवमूल्यन का कारण बनेगी।

रुबियो के बयान, जिसमें यह संकेत दिया गया था कि भारत को अगले पांच वर्षों में अमेरिका से अपना वार्षिक आयात दोगुना करना होगा, पर कांग्रेस ने संदेह जताया है। पार्टी ने प्रधानमंत्री से इस मामले पर पांच सीधे सवाल पूछे हैं। कांग्रेस ने इस बात पर जोर दिया कि अन्य देशों ने अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौतों को तब रद्द कर दिया था जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प-काल के टैरिफ को पलट दिया था, जो इन समझौतों का आधार थे।

विपक्षी दल ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को कथित दबाव में की गई रियायतों से भी जोड़ा है। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि यह सौदा प्रधानमंत्री द्वारा संसद में एक खुलासे के बाद कथित दबाव में जल्दबाजी में किया गया था, जिससे मोदी सरकार ने एकतरफा महत्वपूर्ण रियायतें दीं जो भारतीय किसानों और उद्योगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

इसी कड़ी में, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर गौतम अडानी को अमेरिकी कानूनी मामले में राहत दिलाने के लिए राष्ट्रीय हितों से समझौता करने का आरोप लगाया है। गांधी ने दावा किया कि व्यापार समझौता कोई वास्तविक सौदा नहीं था, बल्कि “अडानी की रिहाई के लिए सौदा” था। उन्होंने उन रिपोर्टों का हवाला दिया कि अमेरिकी सरकार अडानी के खिलाफ कथित रिश्वतखोरी के आरोपों से जुड़े मुकदमों को निपटाने या खारिज करने पर विचार कर रही है।

जयराम रमेश ने भी इन भावनाओं को दोहराते हुए प्रधानमंत्री पर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने के बजाय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की धमकियों पर काम करने का आरोप लगाया। रमेश ने मोदी सरकार के व्यापार समझौते पर सहमत होने के औचित्य पर भी सवाल उठाया, इसे “निराशाजनक रूप से एकतरफा” बताया और कहा कि यह भारत के बजाय अमेरिकी हितों की सेवा करता है। उन्होंने 10 मई 2025 को “ऑपरेशन सिंदूर” के अचानक बंद होने का भी उल्लेख किया, यह सुझाव देते हुए कि यह राष्ट्रपति ट्रम्प के दबाव में किया गया था।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर विवाद ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है, जिसमें विपक्षी दल सरकार पर पर्याप्त रोजगार सृजित करने और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने में विफल रहने का आरोप लगा रहे हैं। हालांकि, सरकार लगातार यह कहती रही है कि भारत सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना हुआ है और इसने बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, डिजिटलीकरण और कल्याणकारी कार्यक्रमों में अपनी पहलों को विकास के प्रमुख चालकों के रूप में उजागर किया है।

अमेरिकी सांसद की यह यात्रा, जिसका उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना है, ऐसे समय में आई है जब वाशिंगटन की व्यापार और टैरिफ नीतियों के कारण तनाव का दौर रहा है। हालांकि इन टैरिफ में से कई को एक अंतरिम समझौते में वापस ले लिया गया था, लेकिन एक व्यापक व्यापार सौदा अभी तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है। रुबियो ने जल्द ही एक द्विपक्षीय व्यापार सौदे को अंतिम रूप देने के बारे में आशावाद व्यक्त किया, यह कहते हुए कि यह दोनों देशों के लिए “लाभकारी” और “टिकाऊ” होगा। उन्होंने संकेत दिया कि वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए जल्द ही एक अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल भारत का दौरा करेगा।

अपनी यात्रा के दौरान, रुबियो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से भी मुलाकात की, जिसमें सुरक्षा, व्यापार और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में सहयोग को गहरा करने के तरीकों पर चर्चा की गई। बैठकों में ऊर्जा सुरक्षा पर भी बात हुई, जिसमें रुबियो ने भारत की आपूर्ति में विविधता लाने के लिए अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों की क्षमता पर प्रकाश डाला और जोर दिया कि अमेरिका ईरान को वैश्विक ऊर्जा बाजार को बंधक बनाने की अनुमति नहीं देगा।

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