इबोला का डर: युगांडा ने कांगो सीमा सील, भारत पर खतरा?

अफ्रीकाइबोला का डर: युगांडा ने कांगो सीमा सील, भारत पर खतरा?

युगांडा ने <a href="/%e0%a4%87%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95/" title="इबोला अलर्ट पर भारत सतर्क, देशों में सख्ती”>इबोला के बढ़ते खतरे को देखते हुए कांगो के साथ सीमा की सील

युगांडा ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) के साथ अपनी सीमा को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया है। यह कदम इबोला वायरस के फैलाव को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है, क्योंकि डीआरसी में इस जानलेवा बीमारी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और युगांडा में भी कुछ मामले सामने आए हैं।

स्थानीय इबोला टास्क फोर्स द्वारा लिए गए इस फैसले के पीछे एक बड़ी चिंता यह भी है कि सीमा पार करने वाले कांगो के मरीज़ों के संपर्क में आने से युगांडा के स्वास्थ्यकर्मी भी संक्रमित हो रहे हैं। १५ मई को आधिकारिक तौर पर प्रकोप घोषित होने से पहले ही कई कांगो वासी युगांडा पहुँच चुके थे।

हालांकि, यह कदम विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सलाह के विपरीत है। WHO ने सीमा बंद न करने की सलाह दी है, क्योंकि उनका मानना है कि ऐसे कदम अक्सर डर पर आधारित होते हैं और इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। इसके बजाय, सीमा बंद करने से लोग अनधिकृत रास्तों से आवाजाही बढ़ा देते हैं, जिन पर निगरानी रखना मुश्किल होता है।

WHO ने पहले ही बुंदीबग्यो स्ट्रेन के इबोला प्रकोप को “अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय” घोषित किया है। संगठन स्वीकार करता है कि जनसंख्या की आवाजाही और व्यापार के कारण पड़ोसी देशों के लिए खतरा अधिक है, लेकिन सीमा बंद करने को वैज्ञानिक रूप से सही नहीं मानता।

युगांडा में अब तक इबोला के सात पुष्ट मामले सामने आए हैं, जिनमें १४ मई को कंपाला में एक ५९ वर्षीय व्यक्ति की मौत भी शामिल है। इन मामलों में से कई के तार डीआरसी में हुए शुरुआती प्रकोप से जुड़े हैं। खबरों के मुताबिक, कांगो के मरीजों का इलाज करने वाले युगांडा के स्वास्थ्यकर्मी भी संक्रमित हुए हैं। साथ ही, लक्षण वाली एक कांगो महिला जो युगांडा आई थी, वह भी पॉजिटिव पाई गई।

इस प्रकोप का केंद्र डीआरसी के इटुरी प्रांत में है, जहाँ संदिग्ध मामलों की संख्या लगभग १००० तक पहुँच गई है और कम से कम २२० संदिग्ध मौतें हुई हैं। कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय ने १०१ मामलों की पुष्टि की है और ३००० से अधिक संभावित संपर्कों की जांच कर रहा है। डीआरसी में प्रकोप को नियंत्रित करने में चल रहे संघर्ष, बड़ी संख्या में विस्थापित आबादी और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे जैसी चुनौतियाँ आड़े आ रही हैं।

युगांडा और कांगो के बीच की सीमा सैकड़ों किलोमीटर लंबी है और इस पर कई पैदल रास्ते हैं, जिससे पूरी तरह से सीमा नियंत्रण मुश्किल हो जाता है। हालांकि आधिकारिक सीमा चौकियों को बंद कर दिया गया है, लेकिन अनौपचारिक रास्तों पर बढ़ी हुई गतिविधि से वायरस के और फैलने की चिंता बनी हुई है।

केवल कुछ विशेष आपातकालीन परिस्थितियों में ही सीमा पार करने की अनुमति होगी। इनमें इबोला प्रतिक्रिया दल, मानवीय सहायता, सुरक्षा अभियान और आवश्यक माल व खाद्य परिवहन शामिल हैं। आपातकालीन प्रावधानों के तहत युगांडा में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों को २१ दिनों की अनिवार्य आत्म-अलगाव अवधि से गुजरना होगा।

यह पहली बार नहीं है कि बुंदीबग्यो इबोला स्ट्रेन ने इस क्षेत्र को प्रभावित किया है। इससे पहले २००७ में युगांडा और २०१२ में डीआरसी में भी ऐसे प्रकोप हुए थे, जिनमें मृत्यु दर काफी अधिक थी। हालांकि, वर्तमान में इस विशेष स्ट्रेन के लिए कोई स्वीकृत टीका या विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है, इसलिए सहायक देखभाल और मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।

यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य की अनिवार्यता और सीमावर्ती क्षेत्रों की आर्थिक व सामाजिक वास्तविकताओं के बीच नाजुक संतुलन को दर्शाती है। सीमा बंद करने का निर्णय, अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य सिफारिशों के बावजूद, वायरस के तेजी से फैलने की गहरी चिंताओं को रेखांकित करता है।

युगांडा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने निगरानी उपायों को बढ़ाया है और जिलों को विभिन्न जोखिम स्तरों में बाँटा है। संक्रमण के जोखिम को कम करने के लिए देश ने बड़ी सभाओं को भी स्थगित कर दिया है, जिनमें डीआरसी और अन्य पड़ोसी देशों से तीर्थयात्रियों को आकर्षित करने वाला एक वार्षिक धार्मिक आयोजन भी शामिल है।

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