जम्मू और कश्मीर में शराबबंदी की मांग फिर उठी, अल्ताफ बुखारी ने दोहराई अपनी बात
श्रीनगर: जम्मू और कश्मीर में शराबबंदी को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। जम्मू और कश्मीर अपनी पार्टी के अध्यक्ष, अल्ताफ बुखारी ने केंद्र शासित प्रदेश में शराब की पूर्ण बिक्री पर रोक लगाने की अपनी मांग को फिर से दोहराया है। एक बयान में, बुखारी ने कहा कि यदि गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में शराबबंदी सफलतापूर्वक लागू की जा सकती है, तो जम्मू और कश्मीर में भी इस पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने नशीली दवाओं के खिलाफ चल रहे अभियानों का समर्थन करते हुए कहा कि मादक द्रव्यों का सेवन समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक गंभीर खतरा है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बुखारी ने विपक्षी राजनीतिक दलों पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि ये दल शराबबंदी के मुद्दे पर ढुलमुल रवैया अपना रहे हैं और जनता को झूठे वादों से गुमराह कर रहे हैं। बुखारी ने सुझाव दिया कि पर्यटकों के लिए हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों जैसे निर्दिष्ट स्थानों पर नियंत्रित परमिट प्रणाली के तहत शराब उपलब्ध कराई जा सकती है, लेकिन आम जनता के लिए इसकी उपलब्धता को सीमित किया जाना चाहिए।
जम्मू और कश्मीर में शराबबंदी का मुद्दा नया नहीं है। विभिन्न राजनीतिक नेता और दल इस पर अपनी अलग-अलग राय रख चुके हैं। हाल ही में, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने कहा था कि यदि केंद्र सरकार शराब की बिक्री से होने वाले राजस्व के नुकसान की भरपाई करती है, तो शराबबंदी लागू की जा सकती है। उन्होंने वित्तीय निहितार्थों पर भी जोर दिया, क्योंकि शराब की बिक्री केंद्र शासित प्रदेश के राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देती है। पिछले तीन वित्तीय वर्षों में, शराब की बिक्री से लगभग ₹3,450 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ है, जिसमें जम्मू जिला सबसे अधिक राजस्व वाला क्षेत्र रहा है।
इसके विपरीत, जम्मू और कश्मीर सरकार की ओर से पहले विधानसभा में दिए गए एक लिखित जवाब में कहा गया था कि केंद्र शासित प्रदेश को ‘ड्राई स्टेट’ घोषित करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। सरकार ने आगाह किया था कि शराबबंदी से तस्करी, अवैध शराब बनाने और शराब माफियाओं को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ गंभीर जन स्वास्थ्य जोखिम भी पैदा हो सकते हैं। सरकार का यह भी मानना था कि शराबबंदी से पर्यटन, आतिथ्य, परिवहन और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे कई लोगों की आजीविका प्रभावित होगी।
वर्ष 1958 के आबकारी अधिनियम के तहत, जम्मू और कश्मीर में सार्वजनिक स्थानों पर शराब का सेवन सख्त वर्जित है, हालांकि वैध लाइसेंस के साथ निजी तौर पर इसका सेवन किया जा सकता है। हाल ही में डल झील में कुछ लोगों द्वारा शराब पीने के वायरल वीडियो ने प्रवर्तन और मौजूदा नियमों पर चर्चा को फिर से हवा दी है।
बुखारी की शराबबंदी की मांग विभिन्न समूहों द्वारा उठाई गई चिंताओं से मेल खाती है, जो शराब की उपलब्धता के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को लेकर चिंतित हैं। उनकी पार्टी लोगों के हितों को सर्वोपरि रखने की राजनीति पर जोर देती है और क्षेत्र में “परिवारवाद” और “झूठे नैरेटिव” को खारिज करती है। अपनी पार्टी समावेशी सिद्धांतों की वकालत करती है और उसका लक्ष्य दिल्ली में जम्मू और कश्मीर के लोगों का प्रतिनिधित्व करना है, न कि केंद्र के लिए बिचौलिए के रूप में कार्य करना।
इस राजनीतिक बहस में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का रुख भी शामिल है, जिन्होंने पहले कहा था कि शराब की दुकानें उन लोगों के लिए हैं जिनका धर्म शराब के सेवन की अनुमति देता है, और सरकार किसी को भी पीने के लिए मजबूर नहीं कर रही है। इस रुख की आलोचना हुई है, विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया है कि गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में शराबबंदी लागू होने के बावजूद यहां इस पर रोक क्यों नहीं लगाई जा रही है। चल रही चर्चाएं जम्मू और कश्मीर में शराब नीति से जुड़े सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक विचारों के जटिल मिश्रण को दर्शाती हैं।
